सुधाकर सिंह ने कहा- ‘यदि पंचायतों के राजस्व बढ़ाने का सबसे आसान तरीका ग्रामीणों पर नए कर और शुल्क थोपना बन जाएगा, तो इसका सबसे अधिक असर गरीब और मेहनतकश वर्ग पर पड़ेगा, जिसकी आय पहले से ही सीमित है।’
पटना। राजद सांसद व राजद किसान प्रकोष्ठ के अध्यक्ष सुधाकर सिंह ने बिहार सरकार द्वारा ग्रामीण क्षेत्रों में कर लगाने के फैसले की कड़ी निंदा की है। सुधाकर सिंह ने शनिवार को प्रेस कॉन्फ्रेंस करके कहा कि सरकार के इस निर्णय का बिहार की ग्रामीण अर्थव्यवस्था पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ेगा और इससे गरीब ग्रामीणों का आर्थिक दोहन होगा। प्रेस कॉन्फ्रेंस में जाने-माने अर्थशास्त्री, भारत सरकार के पूर्व योजना आयोग के पूर्व सचिव तथा नेशनल इंस्टीट्यूट ऑफ लेबर इकोनॉमिक्स रिसर्च एंड डेवलपमेंट के पूर्व महानिदेशक डॉ. संतोष मेहरोत्रा भी मौजूद थे। सुधाकर सिंह ने कहा कि बिहार सरकार ने 15 जुलाई को हुई कैबिनेट बैठक में बिहार पंचायत राज अधिनियम 2006 के तहत बिहार ग्राम पंचायत (कर, दर एवं शुल्क) नियमावली 2026 को मंजूरी दे दी है। सरकार का यह फैसला गांवों को आर्थिक रूप से कमजोर करने वाला है। एक ओर ग्रामीण जनता पहले से महंगाई और बेरोजगारी की मार झेल रही है, वहीं दूसरी ओर नई नियमावली उनके आर्थिक बोझ को और बढ़ा देगी। उन्होंने कहा कि यदि पंचायतों के राजस्व बढ़ाने का सबसे आसान तरीका ग्रामीणों पर नए कर और शुल्क थोपना बन जाएगा, तो इसका सबसे अधिक असर गरीब और मेहनतकश वर्ग पर पड़ेगा, जिसकी आय पहले से ही सीमित है।
सुधाकर सिंह ने कहा कि बिहार आज भी प्रति व्यक्ति आय, औद्योगिक विकास, रोजगार सृजन और ग्रामीण आय जैसे प्रमुख मानकों पर देश के अग्रणी राज्यों से काफी पीछे है। इस निर्णय का सबसे पहले असर उन लोगों पर पड़ेगा, जो ठेला, खोमचा, रेहड़ी, टमटम, रिक्शा, बैलगाड़ी, हाथगाड़ी अथवा छोटे परिवहन साधनों के जरिए अपने परिवार का पालन-पोषण करते हैं। इन लोगों की आमदनी निश्चित नहीं होती। कई बार पूरे दिन की मेहनत के बाद भी इतनी आय नहीं हो पाती कि परिवार का भोजन, बच्चों की पढ़ाई और इलाज का खर्च आसानी से चल सके। ऐसे लोगों पर यदि हाउस टैक्स, नल-जल टैक्स, पंजीकरण शुल्क, उपयोग शुल्क या अन्य स्थानीय करों का अतिरिक्त बोझ डाला जाएगा तो उनकी आजीविका और संकट में पड़ जाएगी। उन्होंने कहा कि सबसे गंभीर चिंता इस बात की है कि पंचायतों द्वारा लगाए जाने वाले कर और शुल्क का प्रभाव केवल कर दाता तक सीमित नहीं रहेगा, बल्कि इसका असर पूरी ग्रामीण अर्थव्यवस्था पर पड़ेगा। छोटे व्यवसायियों की लागत बढ़ेगी, वस्तुओं और सेवाओं की कीमतों में वृद्धि होगी, रोजगार के अवसर घटेंगे और ग्रामीण बाजारों की क्रय शक्ति कमजोर होगी, इससे स्थानीय आर्थिक गतिविधियां भी प्रभावित होंगी।
सुधाकर सिंह ने कहा कि पंचायत राज अधिनियम की धारा 27 पंचायतों को कर लगाने का अधिकार जरूर देती है, लेकिन यह अधिकार राज्य सरकार द्वारा बनाए गए नियमों और निर्धारित अधिकतम दरों के अधीन है। इसलिए राज्य सरकार की जिम्मेदारी है कि इस अधिकार का उपयोग गरीब जनता पर अतिरिक्त आर्थिक बोझ डालने के साधन के रूप में न होने दे। उन्होंने कहा कि सरकारी कार्यालयों में भ्रष्टाचार और अवैध वसूली पहले से ही चरम पर है। ऐसे में यदि ग्राम पंचायतों को विभिन्न प्रकार के कर, दर और शुल्क वसूलने का व्यापक अधिकार दिया जाता है, तो भ्रष्टाचार के नए अवसर पैदा होंगे। आज स्थिति यह है कि जिन सेवाओं के लिए सरकार द्वारा निर्धारित शुल्क बहुत कम है, वहां भी आम नागरिकों से कई गुना अधिक राशि वसूली जाती है। भूमि की रसीद कटवाने में भी निर्धारित शुल्क से अधिक पैसे लिए जाते हैं। सुधाकर सिंह ने कहा कि एफआईआर दर्ज कराना पूरी तरह निशुल्क है, लेकिन बिना पैसे दिए कई जगह प्राथमिकी दर्ज नहीं होती। दाखिल-खारिज की प्रक्रिया भी निशुल्क है, फिर भी लोगों से अवैध वसूली की शिकायतें आती रहती हैं। जब पहले से उपलब्ध सरकारी सेवाओं में ऐसी स्थिति है, तब पंचायत स्तर पर नए कर एवं शुल्क लगाने का अधिकार भ्रष्टाचार के नए रास्ते खोल सकता है। उन्होंने कहा कि यदि कोई गरीब परिवार आर्थिक तंगी के कारण पंचायत द्वारा लगाए गए कर या शुल्क का समय पर भुगतान नहीं कर पाएगा, तो स्थानीय स्तर पर उसके राशन कार्ड, बिजली कनेक्शन, सरकारी योजनाओं के लाभ या अन्य आवश्यक सेवाओं को लेकर मनमानी की आशंका बढ़ सकती है। इससे गरीब और कमजोर वर्ग सबसे अधिक प्रभावित होगा। एक ठेला चलाने वाला, टमटम हांकने वाला, बढ़ई, लोहार, कुम्हार, माली, नाई, धोबी, मोची, सब्जी विक्रेता या दिहाड़ी मजदूर अतिरिक्त कर और शुल्क का भुगतान किस आय स्रोत से करेगा। एक ओर बड़े उद्योगपतियों के लाखों करोड़ रुपये के बैंक ऋण माफ किए जाते हैं, जबकि दूसरी ओर बिहार के ग्रामीणों पर नए कर लगाए जा रहे हैं। इस दौरान सुधाकर सिंह ने केंद्रीय ग्रामीण विकास एवं पंचायती राज मंत्री गिरिराज सिंह के वर्ष 2023 के उस बयान का भी हवाला दिया, जिसमें उन्होंने कहा था कि आत्मनिर्भर भारत के लक्ष्य और सतत विकास के लिए ग्रामीण निकायों के अपने राजस्व स्रोत विकसित करना आवश्यक है।
