पटना। पूर्व सांसद आनंद मोहन की समय से पूर्व रिहाई को चुनौती देने वाली याचिका पर सुप्रीम कोर्ट ने सुनवाई पूरी करते हुए फैसला सुरक्षित रख लिया है। 1994 के जी. कृष्णैया हत्याकांड मामले में जस्टिस दीपांकर दत्ता और जस्टिस शील नागू की पीठ ने बिहार सरकार और प्रशासन की कार्यप्रणाली पर कड़े सवाल उठाए। सुनवाई के दौरान अदालत का मुख्य केंद्र बिंदु यह था कि क्या ड्यूटी पर तैनात एक जिला मजिस्ट्रेट की हत्या रेयरेस्ट ऑफ रेयर अपराध है या नहीं। पटना हाईकोर्ट के पिछले फैसले पर असहमति जताते हुए जस्टिस दत्ता ने तीखी टिप्पणी की यदि ड्यूटी पर तैनात लोक सेवक की हत्या को दुर्लभतम नहीं माना जाएगा, तो फिर किसे माना जाएगा। पीठ ने साफ कहा कि ऐसी न्यायिक टिप्पणियां अपराधियों के हौसले बढ़ाती हैं और उन्हें यह संदेश देती हैं कि वे सरकारी अधिकारियों की जान लेकर भी बच सकते हैं। अदालत ने कहा कि हो सकता है, बिहार के लिए यह स्थिति सामान्य हो लेकिन अन्य राज्यों में न्यायपालिका इसे ऐसे नहीं देखती।

कोर्ट के नियमानुसार किसी दोषी को रिहाई के लिए 14 वर्ष की वास्तविक और कुल 20 वर्ष की सजा पूरी करना अनिवार्य है। पीठ ने पाया कि आनंद मोहन ने अपने पहले आवेदन में खुद माना था कि उन्होंने 20 वर्ष की शर्त पूरी नहीं की है। बावजूद इसके उनकी रिहाई को मंजूरी दी गई। सुनवाई में सबसे चैंकाने वाला तथ्य सामने आया कि जेल अधीक्षक और परिवीक्षा अधिकारी ने माफी बोर्ड को गलत जानकारी दी। बोर्ड को कहा कि आनंद मोहन के खिलाफ कोई मामला लंबित नहीं है, जबकि हकीकत में दो मामले लंबित थे। अदालत ने इसे बोर्ड को गुमराह करना करार देते हुए कहा कि ऐसा प्रतीत होता है कि पूरी प्रक्रिया किसी विशेष दिशा में झुकी हुई थी।